यह विद्रोह काफी बड़े क्षेत्र में फैला परंतु अंग्रेजों ने इसे बड़ी निर्दयता से कुचल दिया। सितंबर 1857 ई० में अंग्रेजों ने दिल्ली पर पुनः कब्जा कर लिया। बहादुरशाह को कैद कर लिया गया, उन पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें रंगून (बर्मा) भेज दिया गया जहाँ 1865 ई० में उनकी मृत्यु हो गई। उनके तीनों बेटों को भी गिरफ्तार कर लिया गया और दिल्ली में खूनी दरवाजे पर मौत के घाट उतार दिया गया। सितंबर 1858 ई० में लखनऊ पर ब्रिटिश सेनाओं का कब्जा हो गया परंतु बेगम हजरत महल ने आत्समर्पण करने से इनकार कर दिया। वे नेपाल भाग गईं। रानी लक्ष्मीबाई को झाँसी से बाहर निकाल दिया गया। तांत्या टोपे की सहायता से उन्होंने ग्वालियर पर कब्जा कर लिया और जून 1858 में बड़ी बहादुरी से लड़ते हुए उनकी मृत्यु हो गई। कुँवर सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए और अप्रैल 1858 ई० में उनकी मृत्यु हो गई। नाना साहब नेपाल भाग गए। तांत्या टोपे ब्रिटिश सेनाओं से दो साल तक मध्य भारत और राजपूताना में लड़ते रहे परन्तु उन्हें अंग्रेजों के एक मित्र ने धोखा दिया और उन्हें फाँसी पर लटका दिया गया। 1858 ई० के अंत तक इस विद्रोह को दबा दिया गया था हालांकि अंग्रेजों को शांति बनाने में काफी समय लगा।
विद्रोह को दबाने में अंग्रेजों ने अमानवीय कृत्य किए। अब विजयी ब्रिटिश सेनाओं ने नरसंहार करना आरंभ कर दिया। अनेक गाँवों को नष्ट कर दिए गया। आगजनी और लूटमार आरंभ कर दी। उन शहरों में जिन्हें अंग्रेज सेना ने विद्रोहियों से छीन लिया था, आगजनं नौर लूटमार की घटनाएँ बहुत हुईं। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि अवध में ही लगभग 1,50,000 लोग मारे गए। बड़ी संख्या में विद्रोहियों को मौत के घाट उतार दिया गया था। अंग्रेजी सेनाओं ने विद्रोही नेताओं, सैनिकों तथा आम जनता पर अमानवीय अत्याचार किये।
1.विद्रोह का स्वरूप
सन् 1857 ई० का विद्रोह भारत का गौरवशाली अध्याय है। पहली बार देश के विभिन्न भागों के बीच एक ऐसे शासन के विरुद्ध एकता स्थापित हुई थी जो सबका शत्रु था। विद्रोह के दौरान ऐसे अनेक नेता और योद्धा उभरे जिनकी वीरता तथा बहादुरी ने उन्हें अमर बना दिया। रानी लक्ष्मीबाई, तांत्या टोपे और बख्त खाँ जैसे नेताओं की वीरता आगे की पीढ़ियों के आजादी के आंदोलन के लिए प्रेरणा तथा देश-प्रेम का स्रोत बनीं।
लेकिन विद्रोह की कुछ बुनियादी कमजोरियाँ थीं, जिसके कारण इसके सफल होने की आशा कम थी। इस विद्रोह के असफल होने के अनेक कारण थे। अंग्रेजों को इंग्लैंड की एक शक्तिशाली सरकार का समर्थन प्राप्त था।
इसके अतिरिक्त भारत में अंग्रेजों के प्रशासनिक केंद्र रेलमार्गों, सड़कों तथा तार सेवा से भली-भाँति जुड़े थे। अतः उन्हें विद्रोह की सभी सूचनाएँ प्राप्त होती रहती थीं। अंग्रेजों के सेनानायक अधिक कुशल और योग्य थे तथा अंग्रेजी सेना भारतीय सेना से अधिक शक्तिशाली थी। अंग्रेजी सेना के पास आधुनिक तकनीक थी जबकि भारतीय सेना पारंपरिक ढंग से ही युद्ध कर रही थी। विद्रोही नेताओं को युद्ध करने का विशेष अनुभव नहीं था तथा उनका आपस में कोई संगठन नहीं था। किसी एक सेनानायक के हाथ में इस विद्रोह का नेतृत्व नहीं था। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों ने विद्रोह का नेतृत्व किया था विद्रोही अपनी विजयों को संगठित नहीं कर सके। इसके अतिरिक्त विद्रोह के असफल होने का एक प्रमुख कारण यह भी था कि कुछ भारतीय रियायतों के शासकों ने इस विद्रोह में भाग नहीं लिया, यहाँ तक कि कुछ ने इस विद्रोह में अंग्रेजों का साथ दिया। विद्रोह के असफल होने का यह भी एक कारण था कि शिक्षित भारतीय इस विद्रोह से अलग रहे।
2. विद्रोह के परिणाम
इस विद्रोह के बाद भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हो गया और 1858 ई० में भारत के ब्रिटिश क्षेत्रों का शासन ब्रिटिश शासन के नियंत्रण में आ गया। ब्रिटिश सरकार का एक मंत्री, जिसे राज्य सचिव कहा गया, संसद के प्रति उत्तरदायी होता था। लॉर्ड केनिंग जो कंपनी के शासन के अंतर्गत अंतिम गवर्नर जनरल था, ब्रिटिश अब शासन के अंतर्गत पहला वायसराय बन गया। उसने 1 नवंबर, 1858 ई० को इलाहाबाद में हुए एक दरबार में महारानी विक्टोरिया की राजाज्ञा पढ़कर सुनाई। इस घोषणा में कहा गया कि भारतीय राजाओं के अधिकार सुरक्षित रहेंगे। इस घोषणा में भारतीय राजाओं की जिन्होंने विद्रोह में अंग्रेजों का साथ दिया था, वफादारी की प्रशंसा की गई। इस घोषणा में यह भी कहा गया कि विलय की नीति के अंतर्गत अब कोई राज्य ब्रिटिश क्षेत्रों में नहीं मिलाया जाएगा। इस घोषणा में यह भी कहा गया कि भारत के धार्मिक और सामाजिक रीतिरिवाजों में अंग्रेज कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे। इसका उद्देश्य यह था कि ब्रिटिश सरकार कट्टरपंथी लोगों की सहानुभूति एवं वफादारी हासिल करना चाहती थी। इसके पश्चात् अंग्रेजों ने फूट डालो और शासन करो नीति का अनुसरण किया जिससे भारतीय अंग्रेजों के विरुद्ध एक नहीं हो सके।
इस घोषणा में आगे कहा गया कि प्रशासनिक सेवाओं में सभी को योग्यता के अनुसार प्रवेश करने की अनुमति होगी। ब्रिटिश अधिकारियों ने इस विद्रोह को सैनिक विद्रोह का नाम दिया। परंतु भारतीय इतिहासकार इसे स्वतंत्रता का प्रथम युद्ध कहते हैं। इस विद्रोह ने भारतीयों में ब्रिटिश शासन से मुक्त होने की भावना जागृत की।
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